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- Aashray Bharat
- Faridabad, Haryana
आश्रय भारत के बारे में
आश्रय भारत फरीदाबाद स्थित एक अलाभकारी, पंजीकृत गैरसरकारी संस्था है, आश्रय भारत फरीदाबाद में पिछले 10 सालों से राज्य की सबसे गंभीर समस्या कन्या भूर्ण हत्या पर काम कर रही है, संस्था लोगो के बीच जाकर कन्या भूर्ण हत्या पर जागरूकता का काम करती है, तथा समाज में बालिकाओ के घटती हुई संख्या पर लोगो का ध्यान केन्द्रित करती, इस जघन्य आपराध के प्रति लोगो को क़ानूनी जानकारी देती है, और समाज में बालिका के प्रति नकारात्मक सोच को बदलना तथा बालिकाओ को पढ़ा-लिखाकर उनको सक्षम बनाने की लिए लोगो को प्रेरित करती है.
Saturday, March 5, 2011
Friday, October 22, 2010
बेटी बचाओ - नारे (SOLOGAN FOR SAVE THE GIRL CHILD IN HINDI)
१. बेटी है कुदरत का उपहार.
मत करो इसका तिस्कार .
२. बेटी बचाओ, बेटी पढाओ.
एक आदर्श माँ-बाप कहलाओ.
३. जीने का भी उसका अधिकार .
बस चाहिय उसको, आपका प्यार .
४. आपकी लालसा है बेकार.
बिन बेटी के न चले संसार .
५. ऐसा कोई काम नहीं, जो बेटियाँ न कर पाई है .
बेटियां तो आसमान से, तारे तोड़ की लाई है .
५. दुल्हन न अगर दुनिया में, दूल्हा कुंवारा रह जायेगा.
क्या होगा इस दुनियां का, कोन मानव वंश चलाएगा .
मत करो इसका तिस्कार .
२. बेटी बचाओ, बेटी पढाओ.
एक आदर्श माँ-बाप कहलाओ.
३. जीने का भी उसका अधिकार .
बस चाहिय उसको, आपका प्यार .
४. आपकी लालसा है बेकार.
बिन बेटी के न चले संसार .
५. ऐसा कोई काम नहीं, जो बेटियाँ न कर पाई है .
बेटियां तो आसमान से, तारे तोड़ की लाई है .
५. दुल्हन न अगर दुनिया में, दूल्हा कुंवारा रह जायेगा.
क्या होगा इस दुनियां का, कोन मानव वंश चलाएगा .
Thursday, April 8, 2010
लूट सको तो लूट लो भैया
लोट खशौट कि छुट है बहिया, लोट सको तो लूट
जनता भूखी प्यासी मरे चाहिए, पीके जहर के घूंट
कम दामों में तुम जितना, हथिया सकते हो हथियालो
मेरे देश कि जनता को लूट के तुम कंगाल बनालो
कम दामों में तुमको मिलेगी भारी छूट
लोट खशौट कि छुट है बहिया, लोट सको तो लूट !
कम पैदावार कि अपवाह हम देश में फैलायेंगे
गोदामों में अनाज हम तुम्हारा पहुचेंगे
देश कि भुक्कड़ जनता से मॉल तुम्हारा बेचेंगे
मुनाफा जो बनेगा मिल बाँट के खायेंगे
हमारा तुम्हारा रिस्ता रहेगा हमेशा अटूट
लोट खशौट कि छुट है बहिया, लोट सको तो लूट!
सड्डा गला जो बच जाय वो गरीबों में बेचेंगे
सड्डे गले आनाज से देश में कुपोषण फैलायेंगे
वादा जनता से किया वो पूरा निभाएंगे
इस देश से गरीबों का नामों निसा मिटायेंगे
बटोर सको तो बटोर देश के सरे नोट
लोट खशौट कि छुट है बहिया, लोट सको तो लूट!
महंगाई को रोना भैया हम जनता के रोयेंगे
मगरमच्छ के आंसू हम भी अपने बहांगे
महगाई को कम करेंगे, कह के आयेंगे
अगले पांच सालों तक मिल मौज मनाएंगे
तुम्हे चाहिए नोट भैया हमें तो चाहिए वोट
लोट खशौट कि छुट है बहिया, लोट सको तो लूट!
महिपाल सिंह नेगी
Thursday, January 28, 2010
कहाँ खो रही है बेटिया
मेरे हिंदुस्तान कहाँ खो रही है बेटिया ?
जिस देश में पूजनीय मानी जाती है बेटियां
जिस देश की कमान संभाल चुकी है बेटियां
जमी से गंगन को जहाँ छु चुकी है बेटियां !
हीन भावना से क्यूँ देखी जाती है बेटियां
क्यूँ हिंसा का शिकार बनती है बेटियां
जन्म से ही पहले ही मारी जाती है बेटियां
क्यों बेटों कि चाहत में मिटा दी जाती है बेटियां !
क्यों डरी सहमी से होती है ये बेटियां
अपने ही घर में क्यूँ पराया होती है बेटियां
घुट_घुट कर क्यूँ जीती है बेटियां
दहेज़ कि बलि क्यों चढ़ जाती है बेटियां!
भेद_भाव को भी सहती है बेटियां
चार दिवारी में क्यूँ कैद रहती है बेटियां
जीना का अधिकार खो जाती है बेटियां
क्यूँ प्यार नहीं पाती है ये बेटियां!
इंदिरा और लक्ष्मी बाई भी थी बेटियां
प्रतिभा और सानिया भी है बेटियां
देश का नाम रोशन करती आ रही बेटियां
फिर भी क्यूँ नफरत में जी रही है बेटियां!
कब अपने देश आजाद हो पायेगी बेटियां
कब इज्जत जीने अधिकार पायेगी बेटियां
बार-बरी का हक कब पायेगी बेटियां
जुल्मों से मुक्ति कब पायेगी बेटियां!
देवी रूप जहाँ मानी जाती है बेटियां
फिर रक्चाश से क्यूँ डरती है देवियाँ
दुर्गा रूप क्यूँ नहीं लेती ये बेटियां
क्यूँ अत्याचारियों के लहू नहीं पीती देवियाँ!
मेरे हिंदुस्तान कि कहाँ खो रही है बेटियां ---------------
Friday, December 11, 2009
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा
भूख से बिलखते बच्चों को देखा
गोदामों में सड़ते आनाजों को देखा
बिन दवा के मरते लोंगों को देखा
मौत के सौदों से जेब भरते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
लड़कियों कि घटती संख्या देखा
दहेज़ लोभियों की संख्या बड़ते देखा
महिलायों पर अत्याचार होते देखा
अत्याचारियों को खुले घूमते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
मजदूरों को बेगार होते देखा
मालिकों की बदलती करों को देखा
गरीबों के घर उजड़ते देखा
आदिवासियों की जमीनों को छिनते देखा
ऐसा ही हिंदुस्तान हमारा.
पानी को तरसते लोगों को देखा
नदिया सागर बिकते देखा
गरीबों कि संख्या बढ़ते देखा
टाटा बिड़ला और अम्बानी फूलते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
धर्म के नाम पर लोंगों को बंटते देखा
राजनीती कि रोटी शेकते ग्धारों को देखा
महगाई कि मर झेलते गरीबों को देखा
नेताओं को करोडपति बनते देखा
ऐसा है हिनुद्स्तान हमारा ... ऐसा है हिंदुस्तान हमारा .
गोदामों में सड़ते आनाजों को देखा
बिन दवा के मरते लोंगों को देखा
मौत के सौदों से जेब भरते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
लड़कियों कि घटती संख्या देखा
दहेज़ लोभियों की संख्या बड़ते देखा
महिलायों पर अत्याचार होते देखा
अत्याचारियों को खुले घूमते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
मजदूरों को बेगार होते देखा
मालिकों की बदलती करों को देखा
गरीबों के घर उजड़ते देखा
आदिवासियों की जमीनों को छिनते देखा
ऐसा ही हिंदुस्तान हमारा.
पानी को तरसते लोगों को देखा
नदिया सागर बिकते देखा
गरीबों कि संख्या बढ़ते देखा
टाटा बिड़ला और अम्बानी फूलते देखा
ऐसा है हिंदुस्तान हमारा.
धर्म के नाम पर लोंगों को बंटते देखा
राजनीती कि रोटी शेकते ग्धारों को देखा
महगाई कि मर झेलते गरीबों को देखा
नेताओं को करोडपति बनते देखा
ऐसा है हिनुद्स्तान हमारा ... ऐसा है हिंदुस्तान हमारा .
Thursday, December 10, 2009
समाज में महिलाओं कि भूमिका
भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जहाँ नारी कि पूजा होती है वहा देवता निवास करते है, परन्तु भारतीय समाज में नारी कि दुर्दसा होती है . महिला को या तो देवी (महिला सक्ती) के आसन पर बैठाया गया है या ताडन का अधिकारी माना गया है. इस पित्रसत्ता समाज में हमेसा उसको दोयम का दर्जे का ही समझा गया है. कभी भी बराबरी का हक नहीं मिला. आँचल में दूध आँखों में पानी को महिलाओं ने अपनी नियति मन लिया है और नियति को सिर्फ स्वीकार किया जाता है, उसके लियें आवाज नहीं उठाई जाती. लडकियों का बचपन से ही बताया जाता है कि ससुराल में डोली जाती है और अर्थी ही बहार निकलती है . इस तरह लड़कियों को हर जुल्म और अत्याचार सहने कि प्रेरणा बचपन से ही लडकियों को माता पिता और समाज के द्वारा दी जाती है .
लड़कियों को घर से और बहार तक अनेक प्रकार कि समस्याओ से झुझना पड़ता है . जैसे ही लड़की बोलने समझने लायक होती है तो यह पुरुष प्रधान समाज उसको रहन-सहन सिखाना शुरू कर देता है. पहले माता-पिता के द्वारा फिर भाई बहन, रिश्तेदार गली मोहले के लोग सिखाने लगते है . उसको उठने-बैठेने से लेकर खाने-पिने , हसने-बोलने सब पर कुछ न कुछ टिका -टिपण्णी कि जाती है . अपने भाई कि तुलना में वह अपने आप को तुच्छ पाती है. माँ-बाप के आदेश के वह अपनी सहेलियों के साथ बहार जाती है , जबकि उसका भाई बेरोक-टोक से अपने दोस्तों से साथ बहार चला जाता है . वह अपनी इच्छानुसार कपडे नहीं पहन सकती . जैसे ही लड़की १७-१८ साल ही होती उसके माँ -बाप को उसकी विवाह कि चिंता सताने लगती है वहा पर जाकर एक लड़की वही सबकुछ करना पड़ता जो उसकी माँ करती थी . ससुराल जाते ही उसे पुरे परिवार (पति, पति कि भाई बहन माँ बाप) का ख्याल रखन पड़ता तथा उनकी बातों को सुनना पड़ता है और तुरन्तु पूरा करना पड़ता है. शादी के बाद बच्चा (लड़का) न होने पर उसको ताना सुनाने पड़ते है. समाज तथा परिवार के लोग लड़का न होने का कारण उसी को मानते है , जबकि विज्ञानं के अनुसार लड़का या लड़की का जन्म पुरुष के क्रोमोजोंश पर निर्भर करता है . महिला कभी बेटी बहना तो कभी बहु पत्नी और माँ कि भूमिका निभाती है. महिला तो समाज के लिए इतनी महत्वपूर्ण है फिर वह दोयम दर्जे कि कैसी हो सकती है. उसके साथ ऐसा भेद भाव क्यूँ है? उसको बारबरी हक क्यों नहीं दिया जाता? वे समाज में अपने आप को क्यूँ असुरक्षित महसूस करती है? ये सभी प्रश्न हमारे बहु-बेटियों के सामने खड़े है . इन सभी सवालो का जबाब हमें हमें अपने-अपने परिवार और समाज में खोजना होगा.
लड़कियों को घर से और बहार तक अनेक प्रकार कि समस्याओ से झुझना पड़ता है . जैसे ही लड़की बोलने समझने लायक होती है तो यह पुरुष प्रधान समाज उसको रहन-सहन सिखाना शुरू कर देता है. पहले माता-पिता के द्वारा फिर भाई बहन, रिश्तेदार गली मोहले के लोग सिखाने लगते है . उसको उठने-बैठेने से लेकर खाने-पिने , हसने-बोलने सब पर कुछ न कुछ टिका -टिपण्णी कि जाती है . अपने भाई कि तुलना में वह अपने आप को तुच्छ पाती है. माँ-बाप के आदेश के वह अपनी सहेलियों के साथ बहार जाती है , जबकि उसका भाई बेरोक-टोक से अपने दोस्तों से साथ बहार चला जाता है . वह अपनी इच्छानुसार कपडे नहीं पहन सकती . जैसे ही लड़की १७-१८ साल ही होती उसके माँ -बाप को उसकी विवाह कि चिंता सताने लगती है वहा पर जाकर एक लड़की वही सबकुछ करना पड़ता जो उसकी माँ करती थी . ससुराल जाते ही उसे पुरे परिवार (पति, पति कि भाई बहन माँ बाप) का ख्याल रखन पड़ता तथा उनकी बातों को सुनना पड़ता है और तुरन्तु पूरा करना पड़ता है. शादी के बाद बच्चा (लड़का) न होने पर उसको ताना सुनाने पड़ते है. समाज तथा परिवार के लोग लड़का न होने का कारण उसी को मानते है , जबकि विज्ञानं के अनुसार लड़का या लड़की का जन्म पुरुष के क्रोमोजोंश पर निर्भर करता है . महिला कभी बेटी बहना तो कभी बहु पत्नी और माँ कि भूमिका निभाती है. महिला तो समाज के लिए इतनी महत्वपूर्ण है फिर वह दोयम दर्जे कि कैसी हो सकती है. उसके साथ ऐसा भेद भाव क्यूँ है? उसको बारबरी हक क्यों नहीं दिया जाता? वे समाज में अपने आप को क्यूँ असुरक्षित महसूस करती है? ये सभी प्रश्न हमारे बहु-बेटियों के सामने खड़े है . इन सभी सवालो का जबाब हमें हमें अपने-अपने परिवार और समाज में खोजना होगा.
Thursday, November 19, 2009
तो जिमाने के लिए कन्या कहा से आएगी
जरा सोचिये, अगर आप नवरात्री के मौके पर जिमाने के लिए चलती फिरती कन्या के जगह मूर्तियों का सहारा लेना पड़े। अगर बेटियों का पैदा होने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहे तो हो सकता आने वाले दिन ऐसे ही हो । नवरात्रे के मौके पर जिमाने के लिए कन्याओं का ऐसा विकल्प तलासना होगा। ऐसे संकेत पूरे देश से मिल रहे है, देश के लगभग सभी राज्यों में ऐसी ही हालत है। जी हां अपने पुण्य के लिए बेटियों को हम पूजना चाहेंगे और वे हमें नही मिलेगी।
यह किसी की दिमागी कल्पना नही है , प्राकृतिक नियमों के अनुसार स्त्री पुरूष लगभग बराबर की संख्या में होने चाहिए। कम से कम स्त्री तो कम नही होनी चाहिए , लेकिन सचाई क्या है । सन २००१ में स्त्री और पुरुषों की गिनती से पता चलता है की भारत में महिलाओं की संख्या पुरुषो की संख्या की अपेक्षा लगभग ६७ कम है।
जिन्हें जिमाया जाता है अब उम कन्या की संख्या का जायजा ले तो पूरे भारत वर्ष में ६ वर्ष से कम उम्र की लडकियों की संख्या लडको की अपेक्षा लगभग ७३ है । यानि गायब है। ये बेटियों तो विसुद रूप से पैदा नही होने दी गयी या पैदा होने के बाद जिंदगी की उमंगो से इन्हे महरूम कर दिया गया ।
अगर आने वाले दिनों में यही हाल रहा तो कहाँ मिलेगी नौ कन्या, नौ देवी पूजने के लिए और जिमाने की लिए। जमीन पर इसका असर दिख ही रहा है, नही मिल रही है कन्याएं , खासकर छोटे बड़े शहरों और कालोनियों में पहले अष्टमी को कन्याओं को जिमाया जाता था, लेकिन अब कन्याओं के आभाव के कारन अब लोग सस्तामी और सातामी को भी कन्याओं को जिमाने लग गए है। क्योकि अब नौ कन्याये बड़ी मुस्किल से मिल रही है, और यहाँ तक की एक ही बेटी कही घरो में कही दिनों तक जिम रही है । अब नौ के संक्या पर जोर नही है, सात भी मिल जाय पाँच ही मिल जाय उतने से ही काम चलाया जा रहा है। आने वाले दिनों में दो या एक की भी नौबत आ जाएगी।
नवरात्री के मौके पर खासकर देवी के रुपौं की आराधना की जाती है , पर उसके बाद साल भर हम क्या अपनी स्त्री जाती की सुध लेते है। हमें जीवित देवियों की भी सुध ले लेनी चाहिए, वरना हम सिर्फ़ पाठ करते रहेंगे और बेटियों के जिंदगी जिदोजहद करती रहेगी।
यह किसी की दिमागी कल्पना नही है , प्राकृतिक नियमों के अनुसार स्त्री पुरूष लगभग बराबर की संख्या में होने चाहिए। कम से कम स्त्री तो कम नही होनी चाहिए , लेकिन सचाई क्या है । सन २००१ में स्त्री और पुरुषों की गिनती से पता चलता है की भारत में महिलाओं की संख्या पुरुषो की संख्या की अपेक्षा लगभग ६७ कम है।
जिन्हें जिमाया जाता है अब उम कन्या की संख्या का जायजा ले तो पूरे भारत वर्ष में ६ वर्ष से कम उम्र की लडकियों की संख्या लडको की अपेक्षा लगभग ७३ है । यानि गायब है। ये बेटियों तो विसुद रूप से पैदा नही होने दी गयी या पैदा होने के बाद जिंदगी की उमंगो से इन्हे महरूम कर दिया गया ।
अगर आने वाले दिनों में यही हाल रहा तो कहाँ मिलेगी नौ कन्या, नौ देवी पूजने के लिए और जिमाने की लिए। जमीन पर इसका असर दिख ही रहा है, नही मिल रही है कन्याएं , खासकर छोटे बड़े शहरों और कालोनियों में पहले अष्टमी को कन्याओं को जिमाया जाता था, लेकिन अब कन्याओं के आभाव के कारन अब लोग सस्तामी और सातामी को भी कन्याओं को जिमाने लग गए है। क्योकि अब नौ कन्याये बड़ी मुस्किल से मिल रही है, और यहाँ तक की एक ही बेटी कही घरो में कही दिनों तक जिम रही है । अब नौ के संक्या पर जोर नही है, सात भी मिल जाय पाँच ही मिल जाय उतने से ही काम चलाया जा रहा है। आने वाले दिनों में दो या एक की भी नौबत आ जाएगी।
नवरात्री के मौके पर खासकर देवी के रुपौं की आराधना की जाती है , पर उसके बाद साल भर हम क्या अपनी स्त्री जाती की सुध लेते है। हमें जीवित देवियों की भी सुध ले लेनी चाहिए, वरना हम सिर्फ़ पाठ करते रहेंगे और बेटियों के जिंदगी जिदोजहद करती रहेगी।
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